“एक इंसान को कैसे अपनी ज़िन्दगी को गुज़ारना चाहिए वह इस्लाम सिखाता है, और यही सबसे सही तरीका है” – सिस्टर लैला सिंग्लेटन

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13मैंने एक सपना देखा था की मैं मर गई हूँ और मैं जन्नत गई, वहां पर मैं ईसा (अलैहिस्सलाम) को ढूंढने लगी क्योंकि मैं चाहती थी की ईसा (अलैहिस्सलाम) मेरा स्वागत करें और मैं एक बाग़ में टहल रही थी। वह बाग बहुत अच्छा था और वह पर बहुत शान्ति थी। मैं आगे बढ़ती जा रही थी तभी एक फरिश्ता मेरे पास आता है और मुझसे कहता है कि ईसा (अलैहिस्सलाम) तुम्हारे ईश्वर नही हैं, उनको मत ढूँढ़ो बल्कि ईश्वर को ही तुमको ढूंढना चाहिए। तो मैं ईश्वर की तलाश करने लगी और तभी मेरी आँख खुल गई और मैं काफी डर गई थी।


अस्सलामु अलैकुम वरहमतुल्लाहि वबराकातुह,

मेरा नाम लैला सिंग्लेटन है। मेरी उम्र 36 साल है। मैं चेस्टफील्ड में पैदा हुई थी। मेरी 2 बड़ी बहनें भी हैं। वह मुझसे 12 और 14 साल बड़ी हैं। इसलिए मैं ऐसे बड़ी हुई की जैसे मेरी तीन माँ हो, एक मेरी माँ और दो मेरी बड़ी बहनें। मेरी माँ एक स्टाल पर काम करती थी और मेरे पिता एक प्लम्बर थे। क्योंकि मेरी बहनें मुझसे बहुत ज़्यादा बड़ी थी तो वही मेरा ख्याल रखती थी। मैं ऐसे परिवार में थी जो की थोड़ा बहुत धार्मिक था। हम मेथोडिस्ट ईसाई थे और अपने पुजारियों पर भरोसा करते थे। हर रविवार को हम चर्च जाते थे। और मैं रविवार को स्कूल भी जाती थी क्योंकि स्कूल में ईसाई धर्म के बारे में पढ़ाया जाता था।

मेथोडिस्ट ईसाई एक तरह से बहुत अलग होते हैं और यह बहुत सुलझे हुए दिमाग के होते हैं। मेरे दिमाग में हमेशा एक बात को लेकर दुविधा रहती थी की मुझको किसको मानना चाहिए ईश्वर को या, ईश्वर के बेटे ईसा को या फिर पवित्र आत्माओं को। मुझको एक दिन स्कूल में पढ़ाया जा रहा था की ईसा ईश्वर हैं और उससे पहले मुझको बताया गया था कि ईश्वर ही ईश्वर हैं। मैं बहुत परेशान सी थी की क्या मतलब है इसका, मैं समझ नही पा रही थी। मैं इस संकल्पना को समझ ही नही पा रही थी।

मैंने एक सपना देखा था की मैं मर गई हूँ और मैं जन्नत गई, वहां पर मैं ईसा (अलैहिस्सलाम) को ढूंढने लगी क्योंकि मैं चाहती थी की ईसा (अलैहिस्सलाम) मेरा स्वागत करें और मैं एक बाग़ में टहल रही थी। वह बाग बहुत अच्छा था और वह पर बहुत शान्ति थी। मैं आगे बढ़ती जा रही थी तभी एक फरिश्ता मेरे पास आता है और मुझसे कहता है कि ईसा (अलैहिस्सलाम) तुम्हारे ईश्वर नही हैं, उनको मत ढूँढ़ो बल्कि ईश्वर को ही तुमको ढूंढना चाहिए। तो मैं ईश्वर की तलाश करने लगी और तभी मेरी आँख खुल गई और मैं काफी डर गई थी।



मैं दुसरे दिन अपने पादरी के पास गई और उनको सारी बातें बताई। उन्होंने कहा कि मैं तुम्हारे सपने को समझ नही पाया। पर तुम स्वर्ग में गई यह बहुत अच्छा संकेत है। और यही बात मेरे दिमाग में बिलकुल बैठ गई कि आखिर इस सपने का मतलब क्या है। मैं यह सोचती रही की मैं अगर मर गई तो मैं क्यू ईश्वर के पास जाउंगी और मैं क्यों ईसा (अलैहिस्सलाम) के पास नही जाउंगी।

इस्लाम में आने के पहले मैंने कभी भी इस्लाम के बारे में नही सोचा था। मेरी इस्लाम को लेकर हमेशा से ही एक नकारात्मक सोच बनी थी। मेरी यह सोच इसलिए ही थी, क्योंकि मैं इस्लाम को नही जानती थी। मीडिया इस्लाम को इस तरह से दिखाता है कि इस्लाम को लेकर इंसान का नजरिया गलत ही बना रहे। मैं हमेशा से यही सोचती थी की इस्लाम एक हिंसा वादी धर्म है। मेरी यह सोच तब तक बनी रही जब तक मैंने इस्लाम के बारे में खोज नही की और उसकी तहकीकात नही की। मैं अब यह सोचती हूँ कि मैंने अपनी पूरी ज़िन्दगी इस्लाम को गलत समझा, पर इस्लाम ऐसा है नही।

इस्लाम एक शान्ति का प्रतीक है। जब मेरी इस्लाम को जानने की इच्छा हुई। मैंने कई मुसलमान दोस्त भी बनाए जिनसे मुझको बहुत सी जानकारियां मिली।

जब मैंने अपना शहादह पढ़ा तो मैंने देखा कि जो पहले से मुसलमान थे वह मेरा ऐसे स्वागत कर रहे थे जैसे मैं उनके परिवार का पहले से ही हिस्सा हूँ। उन्होंने मेरा बहुत साथ दिया। किसी को भी अगर कोई भी परेशानी होती तो मस्जिद के जो कम्युनिटी होती वह सब मिलकर उसकी मदद करने की कोशिश करते। यह उनकी इंसानियत का बहुत ही अच्छा हिस्सा था।

जब मैं 10 साल की थी तो मेरी माँ मेरे पिता से अलग हो गई। मैं अपने पिता के साथ रहती थी और मेरी सौतेली माँ ज़रा भी धार्मिक नही थी जिसका असर मुझ पर भी पड़ा। उस समय मैं डिप्रेशन से गुज़रने लगी थी। मुझको बहुत परेशानी हो रही थी। जब मैं 16 साल की हुई तो मैं अन्य धर्मो को जानने की कोशिश करने लगी। सबसे पहले तो मैंने हिन्दू धर्म को देखा और समझने की कोशिश की फिर मैं अध्यात्मवाद को जानने की कोशिश करने लगी।

मेरी 18 साल की उम्र में ही शादी हो गई थी। और मैं शादी के बाद कनाडा चली गई वहां पर ज़्यादा तर मूल अमेरिकी लोग ही थे। तो मैं उनके धर्म को जानने की कोशिश करने लगी। मेरे पति भी मूल अमरीकी धर्म पर ही चलते थे पर मुझे वह धर्म समझ नही आया। तो हम दोनों के बीच एक समझ की कमी होने के कारण हम दोनों अलग हो गए। उस समय मेरी उम्र 21 साल थी। फिर मैं वापस यूके आ गई।

जब मैं 30 साल की थी तो मेरी एक दोस्त थी उसने मुझसे कहा की तुमने कभी क़ुरआन का पाठ सुना है तो मैंने कहा नहीं। तो उसने कहा एक बार सुनो तुमको बहुत अच्छा लगेगा।

मैंने कभी भी इस्लाम के बारे में कुछ नही सोचा था तो मैंने सोचा की एक बार चलो सुन लेते हैं। मैंने क़ुरआन को सुना और सच में मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं बता नही सकती की मुझको कैसा लग रहा था। एक हल्कापन महसूस हो रहा था और ऐसा लग रहां था कि हाँ इन बातों में सच में कुछ तो बात है।

हालांकि मैंने कभी भी इस्लाम के बारे में कुछ भी नही सोचा था, पर पता नही क्यू मुझे क़ुरआन सुनना अच्छा लगा और मैं इंग्लिश में एक क़ुरआन ले आई। मैंने क़ुरआन को पूरा पढ़ा और क़ुरआन के हर एक अक्षर में इतनी ताकत है कि मैं अब भी उसको पढ़ती हूँ तो मेरे दिल में अलग सा एहसास होता है। जैसे जैसे मैं क़ुरआन पढ़ती गई वैसे वैसे मेरे दिल में जो भी सवाल थे सब के जवाब मुझे मिलते गए।

तब से मैंने सोच लिया की मैं इस धर्म को जानूंगी क्योंकि इस धर्म में सुकून है और जिस तरह से मीडिया इस्लाम को दिखाती है, वैसा इस्लाम बिलकुल भी नही है।

जब मैंने क़ुरआन खोला और पहला पेज पढ़ा जो की सुरह फातिहा है, मैं थोड़ा बहुत हैरान थी। मेरा यह सोचना था की इस्लाम ईसाई धर्म से बिलकुल अलग है और अल्लाह गॉड से बिलकुल अलग हैं। पर जब मैंने क़ुरआन को पढ़ा तो उसमे ईसा (अलैहिस्सलाम) के बारे में लिखा था और उसमें जिब्राईल (अलैहिस्सलाम) के बारे में भी लिखा था। जब मैं छोटी थी तो मैंने ईसाई धर्म की पढाई की थी।

जब मैंने क़ुरआन पढ़ा और यह सब पाया तो मैं थोड़ा चकित थी क्योंकि मैंने कभी सोचा नही था की इस्लाम यह धर्म है। जैसा की मुसलमान मानते हैं की सिर्फ एक ही ईश्वर होता है और वह अल्लाह है। मैंने भी अपने पूरे जीवन में सिर्फ यही माना था कि अल्लाह एक हैं, पर ईसाई धर्म में काफी कशमकश में रहती थी की मैं ईश्वर को मानु या ईसा (अलैहिस्सलाम) को अपना खुदा मानु। इस्लाम के बारे में जब मैंने पढ़ा तो जाना की ईसा (अलैहिस्सलाम), अल्लाह (सुब्हान व तआला) द्वारा भेजे गए एक रसूल थे जो की सही राह पर चलने और एक खुद को मानने का सन्देश देते थे।

मैंने यह फैसला कर लिया था की मैं मुसलमान हो जाउंगी। मैं अपने परिवार के पास गई और मैंने कहा की मैंने क़ुरआन पढ़ा है और मैं मुसलमान होना चाहती हूँ। क्योंकि उस समय 9/11 का हमला हुआ था तो मीडिया की वजह से सब इस्लाम के बारे में गलत ही सोच रखते थे। तो मेरे परिवार वालों ने कहा नही तुम ऐसा बिलकुल मत करो तुम अपनी ज़िन्दगी बर्बाद कर दोगी।

उस समय मुसलमान नहीं होने दिया गया और फिर मेरी एक लड़के से शादी हो गई जो की एक नास्तिक था। मैं उसके साथ रहती थी। मैं क़ुरआन भी पढ़ती थी और मुझको क़ुरआन को छुपा कर रखना पड़ता था। मैं क़ुरआन पढ़ती रही और मैं अपने पति को समझाने की कोशिश करती रही कि मैं मुसलमान होना चाहती हूँ। पर उसने मेरे साथ बहुत गलत किया और मुझसे हिंसा करने लगा।

मैंने क़ुरआन के लिए उसको भी छोड़ दिया। जैसे मैं टूट सी गई थी। पर मैं उस परिस्थिति से लड़ी और मैंने उसका डट कर सामना किया। क्योंकि मैंने क़ुरआन में पढ़ा था की सब्र करने वालों के साथ अल्लाह होता है।

मेरे दोस्तों ने मुझसे कहा की तुम बहुत हिम्मती हो गई हो और तुमने अपने आप को मज़बूत कर लिया है। इस्लाम में आने से पहले मैं बहुत अलग थी जैसे की मैं अब हूँ। पहले मैं बहुत गाने भी सुनती रहती थी और मेरे पास करीब 50 रेंगने वाले जानवर थे। जिनमे से मेरे पास अब भी 2 सांप बचे हैं।

इस्लाम में आकर मुझको एक अंदरूनी शान्ति मिली और मैंने ऐसा एहसास कभी भी नही पाया था। इस्लाम में आने से पहले मैं खुद को भूल से गई थी पर इस्लाम ने मुझे मुझसे मिलाया है। इस्लाम एक इंसान को जीने का तरीका सीखता है की इंसान को कैसे अपनी ज़िन्दगी को गुज़ारना चाहिए और वह ही सबसे सही तरीका है।

इस्लाम में आने से पहले मेरे मन में बहुत से भ्रम थे की इस्लाम महिलाओं को बहुत दबाता है और इस्लाम आतंकवाद को बढ़ावा देता है। पर जब मैंने इस्लाम के बारे में खोज की तो मैंने जाना की ऐसा कुछ नही है। मैंने यह जाना की इस्लाम मूलरूप से शान्ति का प्रतीक है। हम आम तौर पर जब एक दूसरे से मिलते हैं, तो हेल्लो और हाए करते हैं, पर इस्लाम में एक इंसान दुसरे इंसान से कहता है ‘अस्सलामु अलैकुम’ जिसका मतलब है ‘अल्लाह आपको सलामत रखे’ तो इससे ही सोचा जा सकता है की इस्लाम कैसा धर्म है।

तो मैंने अपने इस्लाम के बारे में जो भी गलत फहमी थी मैं उसको दूर करना चाहती थी। तब मैंने जाना की इस्लाम क्या है और मुसलमान कैसे हैं। और उसके बाद मैं इस्लाम में आने के लिए बिलकुल तैयार थी। मैं एक मुसलमान भाई के पास गई और उन्होंने मुझसे कुछ सवाल पूछे और फिर मैंने शहादह पढ़ा और मैं और वह भी रोने लगे। मैं बहुत खुश थी की मैं अब आधिकारिक तौर पर मुसलमान थी। मैं इतनी खुश थी की मैं बता भी नही सकती।

जो भी इस्लाम के बारे में जानना चाहते हैं और इस्लाम में आना चाहते हैं तो मैं उनसे यही कहना चाहती हूँ की आपको मीडिया की बातों पर भरोसा मत करिये। हाँ, मैं ये भी नही कह रही हु की आप सीधा इस्लाम में आ जाइये पर आप जो असली इस्लाम है उसके बारे में जानिये आज हमारे पास हर तरह की सहूलियत है। आप हर भाषा में क़ुरआन पढ़ सकते हैं और इस्लाम को जान सकते हैं।

अनुवाद : बिलाल फ़ैयाज़
साभार :
www.ieroworld.net
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www.ieromedia.com
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