तुर्की ने कहा, यरुशलम पर लिया गया फैसला वापस लेना ही होगा

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तुर्की और यमन ने अरब देशों के समूह और इस्लामी सहयोग संगठन की तरफ से इस आपात बैठक के लिए अनुरोध किया है। इन दोनों देशों ने मंगलवार को प्रस्ताव का ड्राफ्ट बांटा जिसमें कहा गया है कि येरुशलम की स्थिति को बदलने वाले किसी भी फैसले का कानूनी तौर पर कोई असर नहीं होगा और इसे वापस लिया जाना चाहिए।

मिस्र के प्रस्ताव की तरह ही असेंबली के लिए तैयार किए गए प्रस्ताव में भी डॉनल्ड ट्रंप का नाम नहीं लिया गया है। हालांकि इसमें “येरुशलम की स्थिति पर हाल ही में लिए गए फैसले” पर अफसोस जाहिर किया गया है।

सोमवार को मिस्र ने सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव का ड्राफ्ट पेश किया था जिसे सुरक्षा परिषद के सभी 14 सदस्यों ने सोमवार को हुई वोटिंग में समर्थन दिया। लेकिन इस प्रस्ताव को अमेरिका ने वीटो कर दिया। इस मामले पर अकेला पड़ने से अमेरिका झुंझला गया है।

फलस्तीनी राजदूत रियाद मनसौर ने कहा है कि उन्हें इस मुद्दे पर “भारी समर्थन” मिलने की उम्मीद है। उनका कहना है कि येरुशलम एक मुद्दा है जिसे “फलस्तीन और इस्राएल के बीच बातचीत के जरिए” सुलझाया जाना चाहिए।

आम सभा में किसी भी देश का वीटो नहीं है जबकि सुरक्षा परिषद में पांच स्थायी सदस्यों अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, फ्रांस और रूस को वीटो का अधिकार है और ये देश किसी भी प्रस्ताव को रोक सकते हैं। 6 दिसंबर को ट्रंप के लिए फैसले ने अंतरराष्ट्रीय सहमति में दरार पैदा कर दी है और पूरे मुस्लिम जगत ने इसकी कड़ी निंदा की है। अमेरिका के प्रमुख सहयोगी देश ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जापान और यूक्रेन भी 15 देशों वाली सुरक्षा परिषद में शामिल हैं जिसके 14 सदस्यों ने ट्रंप के कदम का विरोध किया है।


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