“तौहीद (एकेश्वरवाद) क्या और क्यूँ……….?”

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तौहीद (एकेश्वरवाद) क्या और क्यूँ………? (भाग – 1)

“ऐ लोगो! आओ एक ऐसी बात की तरफ़ जो हमारे और तुम्हारे बीच है वो ये के हमारा और तुम्हारा मालिक एक हैं जिसे दुनिया मे लोग अलग-अलग नामो से बुलाते हैं जो तमाम आलमे इन्सान के लिये निजात का ज़रिया हैं और वो बात हैं के:

ला इलाहा इल्लललाह मुहम्मदुर्र रसूलुल्लाह (अल्लाह के सिवा कोई माबूद (इबादत के लायक) नही और मुहम्मद सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम अल्लाह के रसूल (ईशदूत अथवा सन्देष्टा) हैं|)”

इस्लाम किसी खास कौम या मुल्क या जाति के लिये नही बल्कि इस्लाम तमाम आलमे इन्सान के लिये हैं| इस्लाम ने जितनी अहमियत तौहीद को दी उतना किसी और चीज़ को नही दी|

बावजूद इसके के इस्लाम का तालीमी निज़ाम आम होने के बाद आज भी इस दुनिया के हर हिस्से मे किसी न किसी जगह शिर्क के मानने वाले पाये जाते हैं|

दुनिया मे बसने वाले आज भी एक खुदा का इकरार तो करते हैं लेकिन बावजूद इसके दूसरो को हाजतरवां व मुश्किलकुशा भी समझते हैं और उनसे अपनी मन्नते और मुरादे मांगते हैं|

दुनिया की इस वक्ती ज़िन्दगी को इन्सान हमेशा-हमेशा की समझता हैं और जन्नत व जहन्नम जो उसे मरने के बाद उसके अमल के मुताबिक हमेशा-हमेशा के लिये मिलेगी उसे भूला बैठा हैं और लोग जन्नत कि तरफ़ जाते हुये कम और जहन्नम की तरफ़ जाते हुये ज़्यादा नज़र आते हैं क्योकि आज दुनिया की चमक-धमक ने इन्सान को इस कदर अन्धा कर रखा हैं के लोग दुनिया को ही अपना हकीकी घर मानते हैं|

जिसका असल सबब रसूल की तालिमात से मुंह फ़ेरना हैं आज जब दीन (धर्म) की बात होती हैं तो लोगो की भीड़ कम ही होती हैं लेकिन दीन (धर्म) के उलट जो भी बात होती हैं उसमे लोगो का हुजूम इस कदर नज़र आता हैं जैसे लोग खालिस दीन(धर्म) का काम करने आये हैं| ऐसे हालात मे हर तौहीदपरस्त की खास तौर से ज़िम्मेदारी हैं के के वो तौहीद की दावत लोगो तक आम करे ताकि लोग शैतान की फ़ैलायी हुयी इस मकर फ़रेबी से बाहर आकर आंखे खोले और सच्चे रब को पहचाने|

रोज़े कयामत इन्सान की निजात सिर्फ़ दो ही चीज़ो पर हैं|

एक ईमान और दूसरे उसके नेक अमल जो दुनिया मे किये होंगे|

ईमान से मुराद अल्लाह की ज़ात पर ईमान, फ़रिश्तो पर ईमान, रसूलो पर ईमान, किताबो पर ईमान, अच्छी और बुरी तकदीर पर ईमान और यौमे(हिसाब किताब का दिन) आखिरत पर ईमान|

नेक अमल से मुराद वो काम जिसका करने का हुक्म नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने दिया हो, या करा हो या नबी के सहाबा मे से किसी ने किया हो तो आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने मना न किया हो|

बिलाशुबह निजात के लिये नेक अमल बहुत अहमियत रखते हैं लेकिन तौहीद और र्नेक अमल मे तौहीद की अहमियत कही ज़्यादा हैं| रोज़े कयामत तौहीद की मौजुदगी मे अमल की कोताहिया तो माफ़ हो सकती हैं लेकिन तौहीद मे बिगाड़(काफ़िराना, मुश्रिकाना या तौहीद मे शिर्क की मिलावट) की सूरत मे ज़मीन व आसमान के बराबर भी नेक अमल इन्सान को कोई फ़ायदा न दे सकेगें|

जैसा अल्लाह ने कुरान मे फ़रमाया:

“जिन लोगो ने कुफ़्र इख्तियार किया और कुफ़्र ही की हालत मे मरे उनमे से कोई अगर (अपने आप को बचाने के लिये) रुए ज़मीन भर कर भी सोना फ़िदया(टैक्स या रिश्वत) मे दे तो उसे कबूल न किया जायेगा| ऐसे लोगो के लिये दर्दनाक अज़ाब हैं और ऐसे लोगो का कोई मददगार नही होगा|” (सूरह अल इमरान 3/91)

यानि ये के न सिर्फ़ उनके अच्छे काम जो उन्होने दुनिया मे किये होगें बरबाद हो ज़ायेगे बल्कि अकीदा तौहीद न होने या मिलावट होने के सबब उन्हे दर्दनाक अज़ाब भी दिया जायेगा जो उन्हे हमेशा-हमेशा दिया जाता रहेगा और न ही कोई उनकी मदद कर पायेगा|

अकीदा शिर्क जो सबसे बड़ा गुनाह हैं अल्लाह ने कुरान मे अनगिनत मुकाम पर इसकी बहुत मज़म्मत की हैं अंबिया (नबी और रसूलो) को वार्निंग भी दी गयी के अगर खुद उनके अकीदे तौहीद मे ज़र्रा बराबर भी शिर्क की मिलावट हुई तो वो भी माफ़ी के काबिल नही:

“(ऐ नबी) यकीनन तुम्हारी तरफ़ और तुमसे पहले गुज़रे हुये तमाम अंबिया की तरफ़ यह वह्यी भेजी जा चुकी हैं कि अगर तुमने शिर्क किया तो तुम्हारा किया कराया अमल ज़ाया हो जायेगा और तुम खसारा(घाटा) उठाने वालो मे से हो जाओगे|” (सूरह ज़ुमर 39/65)

“पस तू अल्लाह के साथ किसी दूसरे को अपना रब न पुकारो वरना तुम भी सज़ा पाने वालो मे शामिल हो जाओगे|” (सूरह शुअरा 26/213)

उपर की दोनो आयतो से साफ़ ज़ाहिर हैं के अल्लाह अपने महबूब बन्दे जनाब मुहम्मद सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम को खिताब करके फ़ैसलाकुन और वार्निंग के अन्दाज़ मे ये हुक्मनामा दिया के शिर्क अंबिया के भी अमल को ज़ाया कर देता हैं| लिहाज़ा अल्लाह के यहा शिर्क नाकाबिले माफ़ी गुनाह हैं| इसके अलावा ऐसा कोई गुनाह नही जिसे अल्लाह चाहे तो माफ़ करे या न करे|

खुद शिर्क की मज़म्मत मे नीचे हदीस नबवी को देखे:

1. नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने हज़रत माज़ रज़ि0 को दस नसीहते फ़रमाई जिसमे से सबसे पहली यह नसीहत थी के अल्लाह के साथ किसी को शरीक न करना चाहे कत्ल कर दिये जाओ या जला दिये जाओ| (मुस्नद अहमद)

2. नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया – सात हलाक करने वाली चीज़ो से बचो, (1) अल्लाह के साह शिर्क करना, (2) जादू, (3) बिलावजह कत्ल करना, (4) यतीम का माल खाना, (5) सूद खाना, (6) मैदाने जंग से भागना और (7) भोली-भाली मोमिन औरतो पर तोहमत लगाना| (मुस्लिम)

3. नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया – अल्लाह उस वक्त तक बन्दे के गुनाह माफ़ करता रहता हैं जब तक अल्लाह और बन्दे क दरम्यान हिजाब न हो| सहाबा रज़ि0 ने अर्ज़ किया – या रसूलुल्लाह सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम! ये हिजाब क्या होता हैं? नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया – हिजाब का मतलब हैं की इन्सान मरते दम तक शिर्क मे फ़ंसा रहे| (मुस्नद अहमद)

ऊपर गुज़री हुई हदीसो से ये अन्दाज़ा लगाना कोई मुश्किल नही के शिर्क ही वो गुनाह हैं जो इन्सान की हलाकत और बरबादी का सबब हैं| इसकी कुछ और मिसाले देखे:

1. रोज़े कयामत हज़रत इब्राहिम अलै0 अपने बाप आज़र की बख्शिश के लिये सिफ़ारिश करेंगे तो जवाब मे अल्लाह ताला इरशाद फ़रमायेगे – मैने जन्नत को काफ़िर के लिये हराम कर दी हैं| (बुखारी)

2. नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के चचा अबू तालिब को कौन नही जानता जिन्होने हर मुश्किल कि घड़ी मे आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम का साथ दिया बल्कि हर तरह से आप कि हिफ़ाज़त कि और कुफ़्फ़रे मक्का के आगे आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के लिये दीवार बन कर खड़े हो गये और अपनी पूरी ज़िन्दगी आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम का साथ देते रहे| यही नही जिस साल जनाब अबू तालीब का इन्तकाल हुआ आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने उसे गम का साल(आमुल हिज़्न) करार दिया लेकिन जनाब अबू तालिब ने एक बार भी कल्मा ला इलाहा इल्लललाह न पढ़ा और अपने इसी अमल की वजह से जहन्नम मे चले जायेगे| (मुस्लिम)

इसके उल्टे अकीदा तौहीद कयामत के दिन गुनाहो का कफ़्फ़ारा और अल्लाह की माफ़ी का सबब बनेगा| इरशादे नबवी हैं:

जिसने ला इलाहा इल्लललाह का इकरार किया और इसी पर मरा, वह जन्नत मे दाखिल होगा| सहाबा ने अर्ज़ किया – चाहे ज़िना किया हो, चोरी की हो? नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया – हां! चाहे ज़िना किया हो, चोरी की हो| (मुस्लिम)

नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया – कयामत के दिन एक आदमी अल्लाह की बारगाह मे हाज़िर होगा जिसके 99 दफ़्तर गुनाहो से भरे होगे| वह आदमी अपने गुनाहो की वजह से मायूस होगा| अल्लाह तालाह इरशाद फ़रमायेगा – आज किसी पर ज़ुल्म नही होगा तुम्हारी एक नेकी भी हमारे पास हैं लिहाज़ा मीज़ान की जगह पर चले जाओ| नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया के उसके गुनाह तराज़ू के एक पलड़े मे डाल दिये जायेगे और नेकी दूसरे पलड़े मे, वह एक नेकी तमाम गुनाहो पर भारी हो जायेगी| वह एक नेकी – अशहदू अल लाइलाहा इल्लल्लाहु व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहु व रसूलुहू होगी| (तिर्मिज़ी)

हज़रत अनस रज़ि0 कहते हैं मैने नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम को फ़रमाते हुये सुना हैं के अल्लाह ताला फ़रमाता हैं – ऐ इब्ने आदम! तू जब तक मुझे पुकारता रहेगा और मुझसे बख्शिश की उम्मीद रखेगा मैं तुझसे होने वाला हर गुनाह माफ़ करता रहूगां| ऐ इब्ने आदम! मुझे परवाह नही अगर तुम्हारे गुनाह आसमान के किनारे तक पहुंच जाये और तू मुझसे माफ़ी तलब करे, तो मैं तुझे माफ़ कर दूगां| ऐ इब्ने आदम! मुझे परवाह नही अगर तू रुए ज़मीन के बराबर गुनाह कर आये और मुझे इस हाल मे मिले कि किसी कि मेरे साथ शरीक न किया हो तो मैं रुए ज़मीन के बराबर ही तुझे मगफ़िरत अता करूंगा| (तिर्मिज़ी)

एक बूढ़ा शख्स नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की खिदमत मे हाज़िर हुआ और अर्ज़ किया – या रसुलुल्लाह सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम! सारी ज़िन्दगी गुनाहो मे गुज़री हैं कोई गुनाह ऐसा नही जो न किया हो, रुए ज़मीन के सारे लोगो मे मेरे अगर गुनाह बांट दिया जाये तो सबको ले डूबे| क्या मेरी तौबा की कोई सूरत हैं? नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने पूछा – क्या इस्लाम लाये हो? उसने अर्ज़ किया – अशहदु अल्ला इलाहा इल्ललाहु व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अबदुहु व रसूलुहु| नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया – जा, अल्लाह माफ़ करने वाला और गुनाहो को नेकियो मे बदलने वाला हैं| उसने अर्ज़ किया – क्या मेरे सारे गुनाह और जुर्म माफ़ हो जायेगे? नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया – हां तेरे सारे गुनाह और जुर्म माफ़ हो जायेगे| (इब्ने कसीर)

ज़रा गौर फ़रमाये:

एक तरफ़ नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के सगे चचा जिन्होने सारी ज़िन्दगी इस्लाम की मदद की लेकिन कल्मा तौहीद का इकरार किये बिना दुनिया से रुखसत हो गये और उनके इसी शिर्क की वजह से उनको जहन्नम का मुस्तहिक ठहराया गया| दूसरी तरफ़ वो शख्स जिसने सारी ज़िन्दगी गुनाह किये लेकिन आखिरी वक्त मे गुनाहो से तौबा कर तौहीद का इकरार किया और जन्नत का मुस्तहिक ठहरा| इन तमाम बातो का निचोड़ सिर्फ़ ये के अकीदा तौहीद ही इन्सान के तमाम गुनाहो का कफ़्फ़ारा और जन्नत की गारन्टी हैं और अकीदा तौहीद पर ही इन्सान के जन्नत और जहन्नम मे जाने का दारोमदार हैं|

भाग – 1 समाप्त

भाग – 2 अभी बाक़ी है…..


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