“नबी (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) के नाम पर झूठ बोलना, दुनिया व आख़िरत की रुसवाई”

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जुमा को हम बहुत सी तकरीरे सुनते है वो खुत्बा ए जुमा में जईफ व मौज़ू (मनगढ़त) रिवायत बयान करते है जिससे दिल इस कदर तंग पड़ता है कि पहले खुत्बा से क़ब्ल या उसके दौरान मस्ज़िद में दाखिल होने को जी ही नही चाहता, क्योंकि जो शख्स किसी खतीब को ऐसी रिवायात बयान करते और उन को रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम की तरफ मंसूब करते हुए सुनता है जिन के बारे में वो जानता है कि ये मनगढ़त है।

रसूलुल्लाह से साबित नही, तो हैरत जदा हो जाता है की वो क्या करे……………….।

अगर तो वो उस मुनकर को सुनकर खामोश रहता है तो गुनाहगार होता है और अगर वो सरे आम खतीब को टोकता है तो अवाम में फ़ित्ना में मुब्तिला होने का खदशा रहता है…………………।

लिहाज़ा खतीब को चाहिए कि अपने मकाम व मर्तबे का खयाल रखते हुए वो मिम्बरे रसूल पर खड़ा होकर हक़ बयान करे वरना इस्लाम के नाम पर वो लोगो को झूठ परोस रहा है, मनगढ़त रिवायात और झूठे किस्से-कहानियों से गुरेज करना चाहिए।

इसके लिए बस मैं यह हदीस पेश कर रहा हूँ…………………..।

हज़रत अबू हुरैराह र.अ. से रिवायत है कि नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम ने फरमाया :

“जिसने दानिसता मुझ पर झूठ बोला, उसे अपना ठिकाना जहन्नुम बना लेना चाहिए।” (बुखारी, किताब अल इल्म, हदीस : 100)

-सद्दाम हुसैन अन्सारी


 

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