“रसूल अल्लाह मुहम्मद (सल्लाहु अलैहि वस्सल्लम) की दावत सिरातलमुस्तकीम की दावत हैं”

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इमाम से मुराद वो इमाम नही जो नमाज़ पढ़ाता हो, इमाम से मुराद वो इमाम नही जो किसी फ़न मे महारत रखता हो और उसकी वजह से उस फ़न मे इमाम कहलाता हो, इमाम से मुराद वो इमाम नही जो अमीर या हुक्मरान हो, इमाम से मुराद वो इमाम भी नही जो नेकी मे पहल करने की वजह से दूसरो के लिये एक नसीहत या नमूना बन जाये बल्कि इमाम से मुराद वो इमाम हैं जिस को अल्लाह तालाह ने इमाम के ओहदे पर रखा हो| जिस का हर हुक्म वाजिबुल इताअत हो, जिस का हर फ़िकरा ज़ाब्ता हयात हो, जिसका हर अमल मशल हिदायत हो, जिसकी इताअत अल्लाह की इताअत, जिस की इमामत वक्ती ना हो बल्कि कयामत तक के लिये हो, जो मासूम (गुनाह से पाक) हो, जिस से दीनी मामलात मे गलती होने का शक भी नामुमकिन हो, जिस कि हर बात वहयी ए इलाही (अल्लाह कि बात) हो|

हाकिम सिर्फ़ एक हैं यानि अल्लाह तालाह|

इस के बन्दो पर सिर्फ़ इसी का हुक्म चलता हैं, दूसरो का नही| लेकिन अल्लाह का हुक्म बन्दे के पास सीधे नही आता बल्कि वो अपने बन्दो मे से ही किसी एक बन्दे को चुन लेता हैं और इस बन्दे को अपने तमाम हुक्म से वाबस्ता कराता हैं| वो बन्दा अल्लाह के तमाम हुक्मो को दूसरो तक पहुंचाता हैं| ऐसे बंदे को नबी या रसूल कहते हैं| रसूल अल्लाह और बन्दे के दरम्यान एक वास्ता होता हैं| इसी के ज़रिये अल्लाह की इताअत होती हैं| इसकी इताअत अल्लाह की इताअत होती हैं|

अल्लाह क़ुरआन मे फ़रमाता हैं:

“जिस ने रसूल की इताअत की इस ने दरहकीकत अल्लाह की इताअत की” (क़ुरआन, सूरह निसा, आयत 80)

रसूल खुद अपनी इताअत नही कराता बल्कि इसकी इताअत अल्लाह के हुक्म से की जाती हैं|

अल्लाह क़ुरआन मे फ़रमाता हैं:

“कोई रसूल हम ने नही भेजा मगर इस लिये के अल्लाह के हुक्म से इसकी इताअत की जाये” (क़ुरआन, सूरह निसा 4, आयत 63)

क्योकि इताअत सिर्फ़ अल्लाह का हक हैं लिहाज़ा बिना अल्लाह के हुक्म और इजाज़त के किसी दूसरे की इताअत नही की जा सकती| अगर कोई शख्स बिना अल्लाह के हुक्म के या इजाज़त के किसी दूसरे की इताअत करता हैं तो इसने दूसरे शख्स की इताअत मे अल्लाह का शरीक बना लिया| ये अल्लाह का काम हैं के अपने किसी बन्दे की इताअत को इन्सानो पर फ़र्ज़ करार दे दे| अगर बन्दा खुद इताअत के लिये किसी और को चुन ले खुद वो (इलाह) अल्लाह बन बैठा और अल्लाह के हक रिसालत पर खुद काबिज़ हो गये और ये शिर्क हैं|

अल्लाह क़ुरआन मे फ़रमाता हैं:

“अल्लाह ही खूब जानता हैं के वो अपनी रिसालत किस को अता करे” (क़ुरआन, सूरह अनआम 6, आयत 124)

लिहाज़ा वो जिस किसी को रिसालत अता करे उसे तमाम इन्सानो का इमाम व मताअ (ताबेदार) बना देता हैं| इमाम बनाना लोगो का काम नही| जो लोग रसूल के अलावा दूसरो को अपना इमाम व मताअ बना ले और इसी की इताअत करे, इन्ही के फ़त्वो को आखिर फ़ैसला समझे वो शिर्क ए रिसालत करते हैं|

सिर्फ़ रसूल ही अल्लाह की तरफ़ से लोगो क इमाम बनाकर भेजा जाता हैं| रसूल को रिसालत और लोगो कि इमामत अल्लाह की तरफ़ से मिलती हैं|

अल्लाह क़ुरआन मे फ़रमाता हैं:

“(ऐ इब्राहिम) मैं तुम्हें लोगो का इमाम बना रहा हूं” (क़ुरआन, सूरह बकरा 2, आयत 124)

हज़रत इब्राहिम जानते थे के इमाम बनाना सिर्फ़ अल्लाह का काम हैं लिहाज़ा वो अल्लाह से दुआ करते हैं:

“(ऐ अल्लाह) मेरी औलाद मे से भी (इमाम बनाना)” (क़ुरआन, सूरह बकरा 2, आयत 124)

अल्लाह फ़रमाता हैं:

“(हाँ बनाऊँगा लेकिन) मेरा वादा गुनाह्गारो के लिये नही” (क़ुरआन, सूरह बकरा 2, आयत 124)

क़ुरआन की इस आयत से साबित हैं के इमाम बनाना अल्लाह का काम हैं न के इन्सानो का|

दूसरी बात ये के इमाम गुनाहगार नही हो सकता बल्कि मासूम होता हैं| लिहाज़ा जो मासूम होगा वही इमाम होगा और जो मासूम नही वो इमाम भी नही और मासूम सिवाये नबी के और कोई नही हो सकता लिहाज़ा सिवाये नबी के कोई और इमाम भी नही हो सकता|

अल्लाह क़ुरआन मे फ़रमाता हैं:

“हम ने इन्हें इमाम बनाया था, ये हमारे हुक्म से लोगो की रहबरी करते थे और हम ने इन को नेक कामो कि वह्यी कि थी” (क़ुरआन, सूरह अंबिया 21, आयत 73)

इस आयत के अलावा अल्लाह ने क़ुरआन मे और बहुत सी जगह फ़रमाया के अल्लाह ने खुद ही लोगो के लिये इमाम चुना| लिहाज़ा ये साबित हुआ के इमाम सिर्फ़ अल्लाह के हुक्म से ही कोई शख्स बनता हैं|

रसूल ही वो ज़ात हैं जिसके हुक्म को अपने तमाम इख्तलाफ़ मे हाकिम मानना और इस के फ़ैसले को बिना कोई बात कहे मान लेना हकीकी ईमान हैं|

जैसा के अल्लाह क़ुरआन मे फ़रमाता है:

“(ऐ रसूल) सो तेरे रब की कसम ये लोग इस वक्त तक हर्गिज़ मुसल्मान नही हो सकते जब तक अपने तमाम इख्तलाफ़ मे आप को हाकिम न मान ले और जो फ़ैसला आप इन के दरम्यान कर दे उस मे किसी किस्म की तन्गी न मह्सूस न करे बल्कि इसे फ़र्माबरदारी के साथ कबूल करे” (क़ुरआन, सूरह निसा 4, आयत 65)

इस आयत से मालूम हुआ के तमाम इख्तलाफ़ मे रसूल सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम का फ़ैसला आखिरी फ़ैसला हैं जो लोग अपने मामलात मे किसी गैर नबी का फ़ैसला मानते हैं जैसा के रसूल सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम का मानना चाहिए बल्कि उस गैर नबी के फ़ैसले को हंसी खुशी तस्लीम करते हैं वो उस शख्स को नबी का दर्जा देते हैं|

रसूल ही की पैरवी करने से अल्लाह बन्दे से खुश होता हैं|

जैसा के अल्लाह क़ुरआन मे फ़रमाता है:

“(ऐ रसूल) आप कह दीजिए अगर तुम अल्लाह से मोहब्बत करते हो तो मेरी पैरवी करो| अल्लाह तुम से मोहब्बत करेगा और तुम्हारे गुनाह माफ़ कर देगा| अल्लाह बड़ा माफ़ करने वाला, रहम करने वाला हैं” (क़ुरआन, सूरह अल इमरान 3, आयत 31)

रसूल ही की पैरवी करने से हिदायत मिलती हैं|

अल्लाह क़ुरआन मे फ़रमाता है:

“हिदायत तो तुम्हे इसी वक्त मिलेगी जब तुम रसूल की इताअत करोगे” (क़ुरआन, सूरह नूर 24, आयत 54)

दूसरी जगह अल्लाह क़ुरआन मे फ़रमाता है:

“और इनकी ताबेदारी करो ताकि तुम राह पर आ जाओ” (क़ुरआन, सूरह आराफ़ 7, आयत 158)

क्या अल्लाह की तरफ़ से ऐसा ओहदा नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के अलावा किसी और को भी मिला हैं| अगर नही तो बिना किसी सनद और ओहदे के कोई शख्स इमाम कैसे हो सकता हैं कैसे इसकी इताअत और पैरवी से हिदायत मिल सकती हैं|

रसूल की ही वो हस्ती हैं जो अपने ओहदे के लिहाज़ से इस बात की हकदार हैं के वो अल्लाह कि शरीयत कि तशरीह व तौसी करें, किसी और को ये हक़ नही हासिल कि वो इसकी तशरीह व तौसी करें|

अल्लाह क़ुरआन में फ़र्माता हैं:

“दलीलो और किताबो के साथ, ये ज़िक्र (किताब) हमनें आप कि तरफ़ उतारा हैं के लोगो कि तरफ़ जो उतारा गया है आप इसे खोल-खोल के ब्यान कर दें, शायद के वो लोग गौर व फ़िक्र करे” (क़ुरआन, सूरह नहल 16, आयत 44)

किसी इन्सान को ये हक़ हासिल नही के रसूल के कौल व फ़ैल कि मु्खालिफ़त करे बल्कि हर इन्सान को इस मुखलिफ़त से डरते रहने चहिय क्योकि रसूल कि मुखलिफ़त सिवाये फ़ितने के और कुछ नही और अल्लाह का आज़ाब इन्सानो पर किसी फ़ितने के सबब ही आता हैं|

अल्लाह फ़रमाता हैं:

“जो लोग रसूल कि मुखालिफ़त करते हैं उन्हे डरते रहना चाहिये के कही इन पर कोई ज़बर्दस्त आफ़त न आ पड़े, या इन्हें दर्दनाक आज़ाब न आ पड़े” (क़ुरआन, सूरह नूर 24, आयत 63)

रसूल ही की वो हस्ती हैं जिस का तरीका तमाम मुसलमानो के लिये ज़ाब्ता हयात हैं, यही वो नमूना हैं जिस के मुताबिक बन कर लोग अल्लाह से कोई उम्मीद कर सकते हैं|

अल्लाह फ़रमाता हैं:

“यकीनन तुम्हारे लिये रसूल की ज़िन्दगी मे बेहतरीन नमूना है इस शख्स के लिये जो अल्लाह और कयामत पर यकीन रखता हैं और कसरत से अल्लाह को याद रखता हैं” (क़ुरआन, सूरह अहज़ाब 33, आयत 21)

ये नमूना अल्लाह ने भेजा, अल्लाह के नमूने के अलावा दूसरे नमूने बनाना सिर्फ़ अल्लाह का काम हैं किसी दूसरे का ये काम करना शिर्क हैं|

रसूल की ही ये ज़ात हैं जिसकी हर बात वह्यी ए इलाही है|

अल्लाह फ़रमाता है:

“रसूल अपनी ख्वाहिश से कुछ नही कहता वो जो कुछ भी कहता है वह्यी होती है” (क़ुरआन, सूरह नजम 53, आयत 3, 4)

क्या ये सनद, औहदे किसी और को भी अल्लाह ने दिये हैं अगर नही तो फ़िर किसी दूसरे की बात कैसे मानी जा सकती हैं बिना किसी सही दलील के|

रसूल ही की ज़ात है जो मासूम और हर गुनाह से पाक होती हैं|

अल्लाह फ़रमाता हैं:

“इसमे शक नही की आप सीधी राह पर हैं” (क़ुरआन, सूरह ज़ुखरूफ़ 43, आयत 43)

क्या रसूल के अलावा कोई और भी हैं जो मासूम हो और राह ए हिदायत पर हैं जिसके बारे मै अल्लाह ने कहा हो| अगर नही तो सिवाये रसूल के और कोई इमाम कैसे हो सकत हैं|

इन्सानो मे रसूल ही वो हस्ती हैं जिसका फ़ैसला मिल जाने के बाद किसी मोमिन को इख्तयार नही के वो खुद किसी मामले मे कोई राय दे या किसी दूसरे की राय ले| लिहाज़ा मोमिन को सिर्फ़ रसूल के ही फ़ैसले पर अमल करना होगा|

अल्लाह फ़रमाता हैं:

“मोमिन मर्द और औरत के लिये जायज़ नही की जब अल्लाह और रसूल किसी मामले मे फ़ैसला कर दे तो फ़िर भी इन्हें इस मामले मे किसी किस्म क इख्तयार बाकि रहे| और जो कोई शख्स भी अल्लह और इस के रसूल की नफ़रमानी करेगा वो सीधी राह से गुमराह हो जयेगा” (क़ुरआन, सूरह अहज़ाब 33, आयत 36)

लिहाज़ा अल्लाह और और उसके रसूल के फ़ैसले कि बाद भी अगर कोई ये सोचे के अभी भी इस फ़ैसले मे किसी और का मशवरा जायज़ हैं तो सीधी राह से गुमराह हो जयेगा| लिहाज़ा अल्लाह और उसके रसूल क फ़ैसला आखिरी फ़ैसला होत है तो कोइ आम इन्सान कैसे इमाम हो सकता हैं की उसके फ़ैसले पर अमल किया जा सकता हैं|

रसूल के ही लिये अल्लाह ने फ़रमाया:

“(ऐ नबी) बेशक आप इन्हें सीधे राह की तरफ़ बुलाते हैं” (क़ुरआन, सूरह मोमिनून 23आयत 73)

“ऐ रसूल आप कह दीजिए के मेरी पैरवी करो यही सीधी राह हैं” (क़ुरआन, सूरह अनआम 6, आयत 153)

ये आयते इस बात की खुली दलील हैं के रसूल सीधी राह पर हैं और रसूल की दावत सिरातलमुस्तकीम की दावत हैं लिहाज़ा रसूल की इताअत करके ही इन्सान सिरातलमुस्तकीम की राह पा सकता हैं।


-सद्दाम हुसैन अंसारी

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