लघु कथा : मुसलमान – मोहम्मद मंसूर आलम

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लघु कथा – मुसलमान

तुम उसके साथ क्यों हंस रहे थे?

क्यों? हँसना मना है क्या?

अरे तुम उसके साथ क्यों हंस रहे थे?

क्यों? हँसना मना है क्या?

हंसना मना नहीं है लेकिन तुम उसके साथ क्यों हंस रहे थे?

क्यों? उसके साथ हँसना मना है क्या?

हाँ, तुम्हारा किसी मुसलमान के साथ हँसना बिलकुल मना है?

क्यों? किसी मुसलमान के साथ हँसना क्यों मना है?

बड़े मुर्ख हो! इन मुसलमानों ने हमारे पूर्वजों के साथ क्या किया? भूल गए?

क्या किया है मुझे नहीं पता!

अरे इन्होंने मिलकर अखंड भारतवर्ष को टुकड़ों में बाँट दिया।

कब?

तुम्हें नहीं पता?

नहीं।

पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफ़ग़ानिस्तान यह सब क्या है?

यह सब देश हैं छोटे छोटे।

हाँ तो, यह सब अखंड भारत का हिस्सा थे।

अच्छा।

तुम्हें नहीं पता!

नहीं।

बड़े मुर्ख हो, इनकी संगती में रहोगे तो धर्म भ्रष्ट हो जाएगा।

अरे नहीं, इनके साथ तो हमने अंग्रेजों से आज़ादी पाई।

यही तो तुम मंदबुद्धियों की समस्या है। कैसे तुम्हें अपने वश में कर लेते हैं, तुम्हें पता भी नहीं चलता। घर भी जाते हो क्या इनके?

हाँ।

तब तो यह भी घर आता होगा तुम्हारे।

हाँ।

हे राम, क्षमा करना यह नहीं जानते, यह क्या कर रहे हैं।

क्या कर रहे हैं?

लव जिहाद का नाम सुना है?

हाँ सुना है, कुछ नेता जी इसमें सम्मिलित हैं।

हे भगवान, नेता जी नहीं यह लोग, यही लोग इसमें सम्मिलित हैं।

अच्छा ।

तुम्हें नहीं पता?

नहीं।

बड़े मुर्ख मालूम पड़ते हो।

मुर्ख तो आप मालूम पड़ते हैं महाशय, मेरा नाम मंसूर है और यह जो टोपी वाला था न, वह सुनील था। हम नाटक मण्डली के लोग हैं। मैं राजगुरु हूँ और वह अशफाकुल्लाह है।


Screenshot_9कहानी संग्रह: एक देश चालीस किस्से
कहानी का नाम: मुसलमान
कहानीकार: मोहम्मद मंसूर आलम
कॉपीराइट: मोहम्मद मंसूर आलम


(साभार मोहम्मद मंसूर आलम के फेसबुक वॉल से)

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