लघु कथा : “रंगीन ख्वाबों वाली कल्लो” – हुमा शाह

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रंग उसका स्याह था तो क्या, ख्वाब तो उसको भी रंगीन आते थे, कभी सात रंगों के इंद्र धनुष जैसे, कभी सरसों जैसे पीले, कभी धानी रंग की साड़ी में खुद को देखती थी, कभी सफ़ेद घोड़े पर राजकुमार दिखता था, वो राजकुमार जो हर लडक़ी का ख्वाब होता है, की जाने वो कब आएगा और उसे अपने संग सात समुन्द्र पार ले जायेगा। पर शायद वो भूल जाती थी की उसका काला रंग उसे कोई सपने देखने की भी इजाज़त नहीं देता, और गलती से ख्वाब देखने की हिम्मत की भी जाये तो जाने कब ख्वाब अचानक टूट कर चकनाचूर हो जाये, उस वक़्त जब कोई बस इतना कह दे की कितनी काली है ये उफ़ तौबा, काली जैसे तवा, काली जैसे कोयला।

घर वालो ने भी बचपन से उसका पक्का रंग देख कर उसे कल्लो कहना शुरू कर दिया था, जाने किस पैर चली गयी है ये घर वाले सोचते थे, और उसका असल नाम क्या था कोई नहीं जान पाया।

जाने कितनी झिड़की खाती थी कभी पापा की तो कभी अम्मा की, कभी बुआ की तो कभी चाची की, पड़ोस पास के सारे बच्चे और हद तो ये की अपनी बहने भी उसे कल्लो ही कह कर चिडाती थीं, और वो उनको मारने को दौड़ती तो अम्मा पापा की जम कर डांट पड़ती। काले रंग ने उसे अपने ही बहिन भाईयों में सौतेला बना दिया था।

सबसे पिटती, लड़ती झगड़ती, जाने कब वो बड़ी हो गयी थी, कुछ भी नहीं बदला था, सिवाए इसके की रंग पहले से कुछ और स्याह हो गया था और शायद उसका मुक़द्दर भी, ऐसा वो अक्सर सोचा करती थी।

फिर अचानक गांव की एक लड़की को एडवोकेट बनते देख एक नए ख्वाब ने उसे भी अपनी लपेट में ले लिया था, कुछ पढ़ने का, आगे बढ़ने का।

स्कूल तो जाने कब का छूट चूका था, दूसरे तीसरे से आगे कहाँ पढ़ पायी थी, अब जब अम्मा से कहा तो जम कर झाड़ खायी, बाबा ने भी दो चपत लगायी। भाईयो से कहा तो उनसे भी मार ही खायी।

काली कलमुँही क्या करेगी पढ़ कर, पढ़ लिख कर भी चुल्हा ही झोंकना है। उसके काले रंग को घर वालो की मार के निशानों ने और गहरा कर दिया था।

फिर मेरा उससे सामने हुआ था, मैं उसके गांव एक केस के सिलसिले में गयी थी, और उससे मुलाक़ात हुई, पहली ही नज़र में उसके स्याह रंग के अलावा उसके तीखे नक़्शे और चमकती आँखों ने मेरा ध्यान उसकी तरफ खींचा।

ठेठ देहाती अंदाज़ में बोलती न जाने क्यों वो मुझे भा गयी थी, बोली दीदी आप जैसा बनना चाहती हूँ, खूब पढ़ना चाहती हूँ, तो मैने कहा पढ़ो, तो रो रो कर अपनी कहानी सुनाती रही, की बचपन से कैसे काले रंग ने उसके तक़दीर को भी अपनी स्याही की चपेट में ले लिया है, जाने उसके लफ़्ज़ों में क्या था कि दिल अंदर से उसके दर्द पर करहाने लगा था, सिर्फ काले होने की इतनी बड़ी सज़ा, अँगरेज़ काले गोरे का भेद करते थे, आज़ाद हुए भारत को ज़माना बीत गया था, लेकिन अब भी हम हम भेद भाव से न निकले थे।

कैसे उसके घर वालो को समझाया, कितना लड़ा, कितना उनको कानून से डराया धमकाया, उसकी पढ़ाई का ज़िम्मा उठाने की ठान ली, जाने कितने दिनों की मशक़्क़त रंग लाई और उसका दाखिला हुआ, वो अलग लंबी कहानी है, लेकिन उन सबसे अलग मैं सोच रही थी की ये वही लोग हैं जो काले काबा के गिलाफ को अक़ीदत से चूमते हैं, एहतराम की निगाह से देखते हैं, आँखों से लगाते हैं, आक़ा की कमली काले रंग को तो थी कुछ लोग सलवार तक काले रंग को नहीं पहनते फिर उसी अल्लाह के बनाये बंदे के काले रंग से इतनी नफरत क्यों?

और ये वही लोग भी हैं जो काली की पूजा करते है, काली यानि महाकाल की काली। ‘काली’ का अर्थ है समय और काल। काल, जो सभी को अपने में निगल जाता है। भयानक अंधकार और श्मशान की देवी। वेद अनुसार ‘समय ही आत्मा है, आत्मा ही समय है’। मां कालिका की उत्पत्ति धर्म की रक्षा के लिए हुयी है, और उसी का माँ को पुजने वालों को काले रंग से इतना बैर?

कोई काली बेटी नही चाहता कोई काली पत्नी नही चाहता, काले रंग से अक़ीदत और अहतराम का ड्रामा करने वाले लोग, काली माता को पूजने वाले लोग ये सब दरअसल अपनी झूटी और दिखावे की दुनिया में जीने वाले लोग हैं।


-हुमा शाह

हुमा शाह
हुमा शाह

(हुमा शाह, एक शायरा, नारी सशक्तिकरण की मिसाल, इंसान के दर्द को दिल से समझने वाली, एक ऐसी महिला हैं जिन्होंने अपने ज़िंदगी का मक़सद, अति पिछड़े और मुस्लिम बच्चों के लिए समर्पित कर दिया है। इन्होंने चौधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय से जामिया हमदर्द से शिक्षा ग्रहण किया, इनका पैतृक निवास सहारनपुर है और इस समय यह नै दिल्ली में रहकर सामाजिक कार्य कर रहीं है। हुमा शाह तालिमी बेदारी नामक संस्था से भी जुड़ी हुई,जो अति पिछड़े और मुस्लिम बच्चों के लिए काम करती हैं। हुमा शाह पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र से भी जुड़ी हैं। इनकी कथा आर्टिकल की शक्ल में है इसे इनके फेसबुक टाइम लाइन से लिया गया है। इस लेख के विचार पूर्णत: निजी हैं, इस लेख को लेकर अथवा इससे असहमति के विचारों का भी myzavia.com स्‍वागत करता है । इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है। ब्‍लॉग पोस्‍ट के साथ अपना संक्षिप्‍त परिचय और फोटो भी myzavia.com@gmail.com भेजें।)


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