लघु कथा : रोज़ा – मोहम्मद मंसूर आलम

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लघु कथा : रोज़ा

रिक्शावाला मुझे खींचने की कोशिश कर रहा था और मैं उसे बार बार और ज्यादा जोर से रिक्शा खींचने के लिए कहे जा रहा था।

अबे थोड़ा तेज़ी से चला न, मेरा रोज़ा खोलने का टाइम हो रहा है।

जी, पूरी ताक़त से चला रहा हूँ साहब।

फिर तेज़ क्यों नहीं हो रहा है!

साहब क्या करें रिक्शा ही तो है।

15 मिनट के बाद मुझे मेरी मंजिल स्टेशन की मस्जिद के बगल में पटना का बेहतरीन रॉयल होटल आ गया था।

कमबख्त ने 15 मिनट लगा दिया 2 किलोमीटर में, क्या खाते हैं यह सब, रिक्शा भी नहीं चलता।

चल रोक दे, यहीं होटल के पास रोक दे, इसी होटल में रोज़ा खोल लेता हूँ। “उफ़, यह गर्मी,” बोलते हुए मैं तेज़ी से रिक्शावाले को पैसे दे कर होटल में घुस गया। जल्दी जल्दी वेटर को जूस और बिरयानी का आर्डर दे कर सड़क की तरफ मुंह करके मेज़ पर बैठ गया और अज़ान के वक़्त का इंतज़ार करने लगा। कमबख्त, आज मौलवी सो गया लगता है, 6:40 तो हो चुके। ठीक 6:41 बजे जैसे ही अल्लाहो अकबर की आवाज़ सुनाई दी, एक सांस में मिक्स्ड जूस गटक गया।

उसके बाद बिरयानी का पहला निवाला मुंह में डालने ही वाला था कि रिक्शे वाले पर नज़र पड़ी। उसने अपने रिक्शे के कस्टमर के बैठने की सीट पर बैठ कर कागज़ से कुछ निकाल कर खाने के बाद स्प्राइट के हरे वाले बोतल से पानी पिया और तशक्कुर में आसमान की तरफ हाथ उठाकर अपने चेहरे पर फेरा और फिर रिक्शा की अपनी सीट पर बैठ गया।

मेरा कलेजा सायं से यह सोच कर हो गया कि वह भी रोज़ेदार है। शायद मस्जिद यहाँ पर देख कर रोज़ा खोलने के लिए यहीं रूक गया था।

उसके चेहरे पर अचानक अजीब सा नूर मुझे रौशन दिखा।

शायद वही नूर हज़रत बिलाल वाला या फिर हज़रत अबू बकर वाला।

मैंने फ़ौरन खाना छोड़ा और दौड़ कर होटल से निकला लेकिन तब तक उसका रिक्शा बहुत ज़्यादा, बहुत ज़्यादा फासला तय कर चूका था ………………………

……………………………………………शायद मैदाने हश्र तक का फासला………………………………….

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-मोहम्मद मंसूर आलम

मेरी अप्रकाशित छोटी कहानियों के संकलन की दूसरी कहानी

(साभार मोहम्मद मंसूर आलम के फेसबुक वॉल से)

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