लघु कथा : ‘फ़ादर्स डे’ – मोहम्मद मंसूर आलम

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मेरा बेटा वृद्ध आश्रम आते हुए मुझसे तपाक से गले मिला और अपने बड़े चौड़े से स्क्रीन के मोबाइल से सेल्फी विद पप्पा ली।

इस हरकत से मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा और आंसू छलक पड़े। एक आस बन गयी कि बेटा को शायद मैं याद आ गया और अब मैं अपने पोते पोतियों के साथ खेल कर अपनी बाक़ी उम्र निकाल लूँगा।

हैप्पी फ़ादर्स डे पापा, चलता हूँ, बस सेल्फी लेने आया था। आज फ़ादर्स डे है ना।

इतना ज़रूरी थी मेरी तस्वीर?

फेसबुक पर लगाना था पापा, वरना आप तो जानते हैं मैं कितना व्यस्त रहता हूँ। यह देखो लगा भी दी, 2 ही मिनट में 10 लाइक भी मिल गए।

अब कब आओगे बेटा ?

अगले साल इसी दिन, एक और सेल्फी के लिए।

इंतज़ार करूंगा, मै बोलता, इससे पहले ही वह खुश हो कर, अपनी मोबाइल पर नज़रे गड़ाए निकल गया……………………….।

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‬-मोहम्मद मंसूर आलम

(साभार मोहम्मद मंसूर आलम के फेसबुक वॉल से)

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