वैलेंटाइन्स डे पर विशेष : “तुमने मुहब्बत को जाना ही नहीं है” – हुमा शाह

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मुहब्बत के लिए एक खास दिन मख़्सूस करने वालो………
तुमने ठीक से मुहब्बत को जाना ही नहीं है…………..
सदियों से चली आ रही ये मुहब्बत ऐसे अनमोल है जिसे किसी एक दिन में किसी एक अवसर मैं बांध ही नहीं जा सकता……………
रगो मे जो बहती है लहू की तरह, सांसो मे जो शामिल है हवा की तरह…………..
फूलो से भी नाज़ुक……………
और हीरे से भी ज़्यादा चमकती हुयी…………..
मायूसी के बादलो को चीर कर उम्मीदों के दियो को रोशन करती मुहब्बत………….
वो मुहब्बत जो ज़िंदा रहने की वजह है…………..
वो मुहब्बत जो बै हयाई से रोकती है………………….
जो सही राह पर चलने को मजबूर करती है……………………….
ये नदामत के उन आंसुओं मेँ भी दिखती है जो किसी को तकलीफ पहुँचाने पर हमारी आँखों से बहते हैं…………………
जो तुफानो का रुख मोड़ देती है, ये हर रुकावट को तोड देती है…………….
ये वो मुहब्बत जो सादगी को नूर बख्शती है, दिलो को सुरूर बख्शती है………….
वो मुहब्बत जो अल्लाह और बन्दे के बीच के उस रिश्ते की मजबूती की गवाह है……………
जब बंदा अपने सारे ज़रूरी काम छोड़ कर नमाज़ के लिये खड़ा हो जाता है……………………..
वो मुब्ब्बत जब एक बाप पूरे दिन रोज़ी रोटी के लिए दर ब दर भटकता है कि उसके बच्चों के लबो पर मुस्कान आ सके……………..
वो मुहब्बत जो प्यारे नबी मुहम्मद मुस्तफा सल्लल लाहू व अल्हये व सल्लम को अपनी उम्मत से थी की वो उनके लिए जारो कतार रोते थे………………………
वो मुहब्बत जब एक माँ के लब अपने बच्चों के लिए दुआएं करते नहीं थकते…………………
उस मुहब्बत को न लफ़्ज़ों में क़ैद किया जा सकता है…………………………
न किसी दिन मे बांधा जा सकता है………………….
इस मुहब्बत को साबित करने के लिए तोहफ़ो का लेन देन ज़रूरी नहीं………………………
इस मुहब्बत को बयां करने के लिए लफ्ज़ अधूरे हैं…………………
मुहब्बत का इज़हार दुनिया की किसी ज़ुबान में किया जाये ये अपना आप मनवा लेती है………………..
दुनिया के किसी भी दुनिया का निज़ाम इसी मुहब्बत के सबब चल रहा है……………
ये जीने की वजह है, ये एतमाद की बुनियाद है……………………
ये मुहब्बत ज़िन्दगी है कभी तो कभी बंदगी है…………………..
मीरा के कृष्ण के लिए प्रेम में ये दिखती है……………..
तो अल्लामाँ इक़बाल के अपनी क़ौम के गोरो फ़िक्र में भी ये दिखाई देती है…………………
ये राम के उस त्याग में दिखती है जब उन्होंने अपना राज पाट छोड़ दिया अपनों की ख़ुशी के लिए…………..
ये हर कहानी का किरदार है……………………..
ये किसी भी शायर के शब्दो और मिसरों में शामिल है छोटे छोटे टुकड़ो की तरह और जब वो टुकड़े एक तरतीब से आपस में जुड़ जाते हैं तो मुहब्बत ग़ज़ल का रूप धर लेती है…………………
ये पाकिज़गी की अलामत है………………….
ये नफ़्स पर काबू पाने का नाम है………………………………..
ये वही मुब्ब्बत है जिसने हिन्दुतान से पाकिस्तान न जाने दिया ये वही मुहब्बत है जो हर दुआ मे वतन की सलामती के लिए ज़बान पर उतरती है…………………….
ये ईमान की अलामत है…………………………….
ये वफ़ा की ज़मानत है…………………………
इसे किसी दिन में न समेटये………………………
इस मुहबत को बदनाम न केजेए…………………..
इस मुहब्बत में ऐसा काम न कीजेए जिसके लिए मुहब्बत खुद शर्मिदा हो जाये……………..।


-हुमा शाह

हुमा शाह
हुमा शाह

(हुमा शाह, एक शायरा, नारी सशक्तिकरण की मिसाल, इंसान के दर्द को दिल से समझने वाली, एक ऐसी महिला हैं जिन्होंने अपने ज़िंदगी का मक़सद, अति पिछड़े और मुस्लिम बच्चों के लिए समर्पित कर दिया है। इन्होंने चौधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय से जामिया हमदर्द से शिक्षा ग्रहण किया, इनका पैतृक निवास सहारनपुर है और इस समय यह नै दिल्ली में रहकर सामाजिक कार्य कर रहीं है। हुमा शाह तालिमी बेदारी नामक संस्था से भी जुड़ी हुई,जो अति पिछड़े और मुस्लिम बच्चों के लिए काम करती हैं। हुमा शाह पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र से भी जुड़ी हैं। इनकी कथा आर्टिकल की शक्ल में है इसे इनके फेसबुक टाइम लाइन से लिया गया है। इस लेख के विचार पूर्णत: निजी हैं, इस लेख को लेकर अथवा इससे असहमति के विचारों का भी myzavia.com स्‍वागत करता है । इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है। ब्‍लॉग पोस्‍ट के साथ अपना संक्षिप्‍त परिचय और फोटो भी myzavia.com@gmail.com भेजें।)


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