हाइटेक व्यवस्था : “संस्थानो की जातिवादी व्यवस्था के दाँवपेंच, जिससे पिछड़े और दलित छात्र परेशान हों रहें हैं” – मुहम्मद ज़ाहिद

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इलाहाबाद स्थित मोतीलाल नेहरू इन्जीनियरिंग कालेज में अपने भांजे के लिए एनआईटी की काउंसलिंग के लिए एम एम हाल के मुख्य द्वार पर जैसे ही पहुँचा एक गाँव का गरीब बूढ़ा व्यक्ति एक रोती हुई लड़की के साथ हाल से बाहर आ रहा था, लड़की बेतहाशा रोए जा रही थी, मैं हैरान था कि काउंसलिंग के लिए आए छात्र छात्राओं में कोई रो भी कैसे सकता है?

हाल के अंदर कुछ छात्र और छात्राएँ बेहद परेशान और निराश थे। मुझे लगा कि कोई बहुत बड़ी समस्या है, हाल में तीन तरफ से काउंटर लगे हुए थे। काउंटर नंबर 1 पर एनआईटी में उत्तीर्ण छात्र छात्राएँ अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर बैंक में ऐडमिशन फीस जमा करने के लिए भेजे जा रहे थे फिर काउंटर नंबर 2 पर डाक्युमेन्टेशन की प्रक्रिया पूरी की जा रही थी।

मैं अपने भांजे की ऐडमिशन फीस जमा करके फिर हाल में पहुँचा तो कुछ छात्र तो आक्रोशित थे परन्तु 3-4 छात्राएँ रो रहीं थीं।

पता करने पर मैं आश्चर्यचकित हो गया कि देश का प्रतिष्ठित संस्था किस तरह अव्यवस्थाओं के बीच काउंसिलिंग करा रही है।

दरअसल 1 जुलाई से 3 जुलाई तक होने वाली प्रातः 10 बजे से शाम 5 बजे तक होने वाली इस काउंसिलिंग का आज आखिरी दिन था और राज्य सरकारों द्वारा जारी जाति प्रमाण पत्र को यह संस्था अस्विकार कर रही थी और केंद्रीय जाति प्रमाण पत्र की माँग कर रही थी, अजीब सी अव्यवस्था है यह कि अपने राज्य द्वारा जारी जाति प्रमाण पत्र उसी राज्य की एक शैक्षणिक संस्था अस्वीकार कर रही थी।

परेशान सभी बच्चे दलित और ओबीसी थे, और इनकी एक वर्ष की मेहनत और परिक्षा के सफल परिणाम सब एक अव्यवस्था के कारण बर्बाद होने जा रहे थे, 2-3 दिन में केंद्रीय सरकार द्वारा जारी जाति प्रमाण पत्र प्राप्त करना भारत जैसे अव्यवस्था वाली व्यवस्था में असंभव ही है।

अपनी मेहनत और लगन से एनआईटी पास करने वाले यह छात्र परेशान थे और छात्राएँ रो रहीं थीं।

दरअसल, दलितों और ओबीसी के लिए आरक्षण, कटआफ या फीस में कटौती करके सरकारें अपनी जिम्मेदारी निभाना समझ लेती है जबकि संस्थानो की जातिवादी ब्राह्मणवादी व्यवस्था ऐसे ऐसे दाँवपेंच चलाती है कि ऐसे पिछड़े और दलित छात्र परेशान हों।

पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों और अनपढ़ माँ बाप के यह छात्र छात्राएँ बदल गये नियम कानून से अनभिज्ञ ही होते हैं। ऐसे दलित और पिछड़ी जातियों के छात्र अचानक हाइटेक व्यवस्था में खुद का सामंजस्य नहीं बना पाते।

यदि आप आरक्षण, कटआफ और फीस में उन छात्रों को लाभ दे रहे हैं तो इस मामले में भी इतनी सख्ती ठीक नहीं, अंग्रेजी में लिखित तमाम नियम कानून सुदूर ग्रामीण क्षेत्र के पिछड़े दलित हिन्दी मीडियम के छात्र समझ नहीं पाते।

इनके लिए काउंसलिंग के पहले ओरिएंटेशन प्रोग्राम भी कराने की व्यवस्था की जानी चाहिए जिससे उनको ऐडमिशन और डाक्युमेन्टेशन की पूरी प्रक्रिया की जानकारी हो और आज जैसी स्थिति से यह बच सकें।

निश्चित ही यह दलित और ओबीसी छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है, देशभर में 30 एनआइटी संस्थाओं में लगभग यही स्थिति होने की संभावना है तो सोचा जा सकता है कि कितने दलित और ओबीसी छात्रों का भविष्य खतरे में आ गया।

यह देश की हाइटेक व्यवस्था है जो आईआईटी के बाद सबसे सम्मानित और उत्कृष्ट संस्थानों में गिनी जाती है।

संस्थाओं को ऐसे परेशान और वापस कर दिए गये ओबीसी और दलित छात्रों को एक अवसर और देना चाहिए।


-मुहम्मद ज़ाहिद

मुहम्मद ज़ाहिद

मुहम्मद ज़ाहिद

(मोहम्मद जाहिद मीडिया एक्टिविस्ट हैं, इनकी लेखनी बेबाक है। मुहम्मद ज़ाहिद फेसबुक यूज़र हैं। मुहम्मद ज़ाहिद की एक वेबसाइट भी है जिसका नाम www.mohdzahid.com है। यह लेख उनकी फेसबुक की टाइम लाइन से लिया गया है। इस लेख के विचार पूर्णत: निजी हैं, इस लेख को लेकर अथवा इससे असहमति के विचारों का भी myzavia.com स्‍वागत करता है । इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है। ब्‍लॉग पोस्‍ट के साथ अपना संक्षिप्‍त परिचय और फोटो भी myzavia.com@gmail.com भेजें।)


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